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जिंदगी और मौत के बीच 210 दिनों तक जूझती रही ये बच्ची...डॉक्टर्स ने इस तरह बचाई जान


 कभी-कभी ऐसा होता है की प्रेगनेंसी के दौरान किन्हीं वजहों या कॉम्प्लीकेशन्स से प्रीमैच्योर डिलीवरी करवानी पड़ती है लेकिन वक़्त से पहले पैदा लिए हुए ऐसे शिशुओं को बहुत ख़ास देखभाल की ज़रूरत होती है। कई बार तो प्रीमैच्योर शिशु की जान तक चली जाती है क्यूंकि उनका शरीर ठीक तरह से विकसित नहीं होता और वो बहुत कमज़ोर होते हैं जिस कारण उनकी जान ख़तरे में पड़ जाती है और इम्यून पावर कम होने क वजह से उनका बचना मुश्किल हो जाता है। लेकिन एक कहावत तो आपने सुनी ही होगी 'जाको राखे साइयां मार सके न कोई' और यह बात साबित हो गई जब हाल ही में डॉक्टरों ने उदयपुर शहर की एक नन्हीं प्रीमैच्योर बेबी को नया जीवन दिया।

 

 

यह केस उदयपुर का है जहाँ भारत ही नहीं बल्कि दक्षिणी एशिया की अब तक की सबसे छोटी और कम वज़न (400 ग्राम) वाली नन्हीं सी जान को जीवनदान देकर डॉक्टरों ने एक नया करिश्मा कर दिखाया है। ख़बरों के मुताबिक़ सात महीने से यह बच्ची ज़िन्दगी और मौत की जंग लड़ रही थी और आख़िरकार इस संघर्ष में उसने जीत हासिल कर ही ली। ऐसा कहा जा रहा है की कोटा के रहने वाले एक दंपत्ति को 35 साल बाद माता-पिता बनने का सुख मिला लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान कुछ मुश्किलों के वजह से जून 2017 में महिला ने सीजेरियन ऑपरेशन के जरिए एक नन्हीं सी बच्ची को जन्म दिया। पर यह ख़ुशी कुछ पल की ही थी क्यूंकि उस वक़्त बच्ची का वज़न सिर्फ 400 ग्राम था और लम्बाई 8.6 इंच, इसके अलावा वो नन्हीं सी जान ठीक तरह से सांस तक नहीं ले पा रही थी और इसी वजह से उसे उदयपुर के नवजात शिशु गहन चिकित्सा में शिफ्ट किया गया और इस दौरान डॉक्टरों और माता-पिता को छोड़कर इस बच्ची को किसी ने नहीं देखा।

 

210 दिनों तक डॉक्टरों के कड़ी मेहनत के बाद इस शिशु का वज़न 2.4 किलो हो गया है और अब वह पूरी तरह स्वस्थ है। ख़बरों के मुताबिक़ इस नन्हीं सी जान के इलाज़ के दौरान एक ऐसा वक़्त भी आया था जब पैसों की कमी की वजह से इलाज़ बंद कराने तक की परिस्थिति आ गई थी लेकिन डॉक्टरों ने इस केस को एक बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया और करीब 75 प्रतिशत इलाज़ का खर्च हॉस्पिटल ने उठाया। इस नन्हीं परी को बचाकर डॉक्टरों ने ना सिर्फ उस बच्ची के माता-पिता को खुशियाँ दी बल्कि एक बार फिर यह साबित कर दिया की डॉक्टर भी भगवान् का एक रूप हैं। 

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