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क्या आप जानती हैं प्रेग्नेंसी में टेंशन लेने से बच्चे के साथ क्या होता है?


  गर्भावस्था खुबसूरत दौर है लेकिन कभी-कभार यह तनावपूर्ण भी हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान तनाव के बहुत से कारण होते हैं। जैसे, गर्भावस्था में असहजता- थकावट, कब्ज, जी मिचलाना आदि से जूझना बहुत दुखद हो सकता है और इससे तनाव होता है। हार्मोनल बदलाव- गर्भवती महिला के शरीर में हार्मोन का उतार चढ़ाव बना रहता है। इससे मूड स्विंग और चिंता होती है। शंकित- गर्भवती महिला का हृदय और मस्तिष्क बहुत सारे संदेहों से भरा होता है। पहली बार मां बनने वाली महिला के दिमाग में बहुत से सवाल होते हैं। जिससे उन्हें तनाव होता है। गर्भावस्था के दौरान नियमित जीवन को संभालना- गर्भावस्था के दौरान घर के काम करना, ज़िम्मेदारी संभालने से भी तनाव होता है।

  गर्भावस्था के दौरान तनाव आपके भ्रूण को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित कर सकता है। गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में अधिक बेचैनी और तनाव से गर्भपात हो सकता है और बाद के दिनों में शिशु के विकास पर इसका असर पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान सामान्य तनाव स्वाभाविक है, हालांकि ज्यादा लम्बे समय तक इसके बने रहने से बहुत से दुष्प्रभाव हो सकते हैं। मां का मूड प्लेसेंटा के कार्य को प्रभावित करता है। जितना अधिक मां बेचैन होंगी उतना ही कम एंजाइम का उत्पादन होगा जो कोर्टिसोल यानी तनाव के हार्मोन को कम करते हैं। यह सिर्फ मां को ही नहीं बल्कि शिशु के सम्पूर्ण विकास को भी प्रभावित करता है।

मां के गर्भ का वातावरण - मां का गर्भ पहला वातावरण होता है, जहां शिशु रहता है। यहां पर यह ध्यान देना जरूरी है कि एक व्यक्ति कैसा होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके जीन्ज किस तरह के वातावरण के संपर्क में होंगे। वातावरण शिशु के स्वास्थ्य और जिंदगी भर उसके व्यावहार को प्रभावित करता है।

हर मां की तनाव से निपटने की अपनी क्षमता और शक्ति होती है। एक महिला के लिए तनावपूर्ण स्थिति दूसरी के लिए बहुत ही हल्की और सहज हो सकती है। इसलिए तनाव से निपटना और इसके प्रति मां का दृष्टिकोण इसमें अहम भूमिका निभाते है।

शिशु के मस्तिष्क का विकास - गर्भवती महिला में तनाव और डिप्रेशन उनके भ्रूण के मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। इससे शिशु में भावनात्मक और व्यावहार संबंधी विकार होने की संभावना बढ़ जाती है। जिन शिशुओं की मां इस दौरान तनाव से जूझती है उन्हें आगे जीवन में डिप्रेशन और तनाव की संभावना बनी रहती है।

बिहेवियर डिसॉर्डर - तनाव से जूझती महिलाओं के बच्चों को व्यवहार संबंधी समस्या हो सकती है जैसे विकास के शुरुआती सालों में एडीएचडी। ऐसा देखा जाता है कि इसी उम्र के अन्य बच्चों के विपरित इन बच्चों में तनाव ज्यादा होता है। वह अन्य बच्चों से अधिक भयावह व्यवहार दिखाते हैं। एमआरआई स्कैन और निदान ने साबित कर दिया है कि ऐसे बच्चों में “अमिगडाला”- मस्तिष्क का हिस्सा जो किसी भी भयावह उत्तेजना के लिए मानव की प्रतिक्रिया से जुड़ा होता है, वह दूसरों की तुलना में बहुत होता है। जब यह बच्चे किशोरावस्था में पहुंचते हैं, तो इनमें मानसिक स्वास्थ्य विकार होने का उच्च जोख़िम होता है।

अन्य जैविक प्रभाव - मां के तनाव और शिशु की लम्बाई में पर्याप्त अंतर है। ऐसा माना जाता है कि तनाव से जूझती मां के शिशु की लम्बाई अन्य मांओं के शिशु से कम होती है।

अतिरिक्त संवेदनशील शिशु - कोर्टिसोल हार्मोन उत्पन्न होता है जब गर्भवती महिला अधिक तनाव लेती है और यह प्लेसेंटा तक पहुंच जाता है। एमिनोटिक द्रव में कोर्टिसोल के उच्च स्तर के कारण मस्तिष्क डोपामिन उत्पादन प्रभावित होता है। इससे शिशु अधिक संवेदनशील बन जाते हैं और उनमें तनाव को सहने की क्षमता भी कम होती है। इससे शिशु भ्रूण में जैविक बदलाव होते हैं और इससे जन्म के बाद तनाव ना ले पाने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इससे हाइपर एक्टिव डिसौडर हो सकता है।

कम आईक्यू स्तर - मां का तनाव लेना शिशु को तब भी प्रभावित कर सकता है, जब वह पूरी तरह जन्म भी नहीं लेता है। इससे शिशु का आईक्यू स्तर कम हो सकता है। इससे कम संज्ञानात्मक, श्रवण, भावनात्मक और सामाजिक विकास होता है।

एपीजेनेटिक बदलाव - गर्भावस्था के दौरान मां द्वारा लिया जाने वाला तनाव, शिशु में एपीजेनेटिक बदलाव का कारण बनता है। यह बदलाव हर जीन को नियंत्रित करता है।

जन्म के समय कम वज़न और समय पूर्व प्रसव - गर्भावस्था में लगातार तनाव लेने से महिलाओं में अन्य समस्याएं उत्पन्न होती है। इन्फ्लेमेशन मां की खराब सेहत से जुड़ा होता है और इससे शिशु के विकास में समस्या होती है। इससे शिशु का कम वज़न और समय से पहले प्रसव होने की संभावना होती है।

अन्य प्रभाव - इसके अन्य प्रभाव है स्टेरायड जीन और यौवनकाल में प्रजनन क्षमता में कमी।

इसलिए यह आवश्यक है कि गर्भावस्था के दौरान आप स्वस्थ जीवनशैली का पालन करें और शांत, खुश और स्वस्थ रहें। 

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