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शिशु की देखभाल की ज़िम्मेदारी परिवार के सदस्य को सौंपने के फायदे और नुक्सान


बच्चे की देखभाल के लिए एक परिवार के सदस्य का होना चाइल्डकेयर का वास्तविक रूप है, खासतौर पर भारत में! पुराने समय में जब हमारे माता-पिता, चाचा-चाची और दादा-दादी एक बड़े संयुक्त परिवार में साथ रहते थे, तो बिना किसी शंका के कहा जा सकता है कि बच्चों का ध्यान अच्छी तरह से रखा जाता था, चाहे उनके माता-पिता आसपास हों या ना हों। खैर अब ऐसा नहीं है, हम में से अधिकतर अब एकल परिवार में रहते हैं और ज्यादा से ज्यादा हमारे साथ माता-पिता रहते हैं। शिशु के जन्म के कुछ ही समय बाद माता-पिता को वापस काम पर लौटने के लिए मजबूर किया जाता है। शिशु की देखभाल के लिए कई विकल्प मौजूद हैं जैसे डे-केयर, नैनी या परिवार के सदस्य जैसे दादा-दादी आदि। हम यहां इस आखिरी विकल्प के फायदे और नुक्सान की जानकारी आपको देंगे, जो की कुछ इस प्रकार है:-

बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी परिवार के सदस्य को सौंपने के फायदे -

यह निःशुल्क है

डे-केयर में दिए जाने वाली राशि के हिसाब से परिवार के सदस्य की देखरेख में शिशु के रहने से आप प्रत्येक महीने 5000-10000 रुपए बचा सकते हैं। कुछ रिश्तेदार आपसे पैसे लेने से इंकार कर सकते हैं लेकिन आपको शिशु की देखभाल पर थोड़ा बहुत तो ख़र्चा करना ही होगा।

आपके विश्वसनीय लोग

ऐसी नैनी को ढूंढना, जो शिशु का ध्यान रखने के लिए विश्वसनीय हो इसकी तुलना में रिश्तेदार भगवान द्वारा भेजे गए विश्वसनीय व्यक्ति लगते हैं। भरोसा होना शिशु की देखभाल के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

स्थायित्व

आपके रिश्तेदार आपके रिश्तेदार ही रहेंगे। यहां एक जगह से दूसरी जगह जाना या काम छोड़ने का विकल्प नहीं है। और इसी कारण वह इस बात का और ध्यान रखते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि आपके बच्चे की अच्छी परवरिश में उनका भी योगदान माना जाएगा। ।

परवरिश के बारे में आपसे विचार साझा करना

अगर आप सभी एक जैसे फैशन या वातावरण में बड़े हुए हैं, तो आपके रिश्तेदारों का भी भोजन, पोषण, स्क्रीन टाइम, सोने का समय और अनुशासन से संबंधी नज़रिया मिलता जुलता होगा। इसका मतलब यह हुआ कि अगर आप भी अपने बच्चे की देखभाल करेंगे,तो उनका संपर्क आपसे टूटेगा नहीं।

जाने-पहचाने

यह आपके शिशु के लिए एक सकारात्मक बिंदु है। अगर आपके रिश्तेदार आपके साथ रहते हैं, तो आपका शिशु उन्हें रोज़ देखता है और उनसे मिलता है। इसके साथ ही शिशु घर पर रहेगा तो उसे अधिक सुकून और संरक्षण महसूस होगा।

ज्यादा ध्यान रखना

डे-केयर से बिल्कुल विपरीत आपके रिश्तेदार शिशु का ज्यादा ध्यान रखते हैं। तो आप सुनिश्चित रह सकते हैं कि आपका शिशु बिना किसी के ध्यान या देखरेख में रो नहीं रहा होगा।

भरोसेमंद

वह बिना बताए कम छोड़कर नहीं जाएंगे। चूंकि वह आपके रिश्तेदार हैं, तो आप जानते होंगे की उनके जीवन में क्या चल रहा है और अगर कोई समस्या आती भी है, तो आप समय पर उसका दूसरा विकल्प या प्रतिस्थापन चुन सकते हैं।

वह बच्चे का पूरा ध्यान रखेंगे चाहे वह बीमार हो या ना हों

पहली बात डे-केयर के मुकाबले घर पर शिशु अधिक संक्रमण के संपर्क में नहीं आते हैं। दूसरी बात अधिकतर डे-केयर बीमार शिशु की ज़िम्मेदारी लेने से बचते हैं। इसके विपरीत आपके रिश्तेदार शिशु के बीमार होने पर उनका और भी ज्यादा ध्यान रखते हैं।

शिशु की देखभाल की ज़िम्मेदारी परिवार के सदस्य को सौंपने की चुनौतियाँ :-

मूल नियमों को निर्धारित करने की समस्या

नैनी की तरह आप अपने रिश्तेदारों को कड़े निर्देश नहीं दे सकते हैं। आपके रिश्तेदारों को यह बुरा भी लग सकता है।

परवरिश करने के तरीके में भिन्नता

यह पूरी तरह से सच है अगर आपके माता-पिता शिशु की देखभाल कर रहे हैं तो। उनके पास अपना निजी अनुभव होता है, जबकि हम में से अधिकतर इस बात पर निर्भर होते हैं कि इंटरनेट और डॉक्टर इसपर क्या सुझाव देते हैं। जब आप कुछ बातों की अपेक्षा करते हैं तो अपनी गैर-मौजूदगी में आप परेशान होते हैं कि उनका पालन किया जा रहा है या नहीं। और आप सीधे तौर पर अपने रिश्तेदारों से सवाल भी नहीं कर पाते हैं।

एहसान और ज़िम्मेदारी

आपके शिशु की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी लेना बहुत मददगार साबित होता है। और अधिकतर आप इसके लिए कोई क़ीमत नहीं देते हैं। अगर आपके रिश्तेदार शिशु की देखभाल के लिए पैसे लेने से इंकार कर दें तो आपको लिए भी उन्हें यह बताना मुश्किल होता हैं कि आप अपने शिशु की देखभाल कैसे कराना चाहते हैं। इसलिए आप एहसान तले दबे होने जैसा महसूस करेंगे।

वह प्रशिक्षित नहीं होते हैं

बिल्कुल, वह जानते हैं कि शिशु का ध्यान कैसे रखना है। लेकिन क्या वह उनका पालन-पोषण भी करते हैं? अधिकतर डे-केयर के लोग आपके शिशु के सामाजिक, शारीरिक और संज्ञानातमक विकास में मदद करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं। वह खेल, कला, शिल्प और संगीत जैसी कई गतिविधियों में लगे होते हैं। हो सकता है आपके रिश्तेदार यह घर पर उपलब्ध ना करा पाएँ।

हो सकता है उनमें उतनी शक्ति ना हो

जैसे ही शिशु बड़ा होता है, वह चलना, भागना और चीजों पर चढ़ने की कोशिश करने लगता है। याद रखें हो सकता है आपके रिश्तेदार बुजुर्ग हों और उनमें सारा दिन शिशु के पीछे भागने की शक्ति ना हो। हालांकि हमेशा नहीं, लेकिन अक्सर शक्ति की कमी के कारण रिश्तेदार बच्चे को टेलीविजन पर व्यस्त रखने की कोशिश करते हैं।

हो सकता है वह एक से अधिक बच्चों की ज़िम्मेदारी ना ले पाएँ

नैनी और डे-केयर के अधिक पैसा कमाने की लालसा के विपरीत हो सकता है आपके रिश्तेदार दूसरे बच्चे की ज़िम्मेदारी लेने में सक्षम ना हो क्योंकि इसमें अधिक समय और ऊर्जा लगती है।

शिशु का सामाजिक ना होना 

डे-केयर का सबसे बड़ा फायदा है कि आपके शिशु को हम उम्र बच्चों के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। इसकी कमी हो सकती है अगर आपका शिशु घर पर ही रहता है।

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