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26 मई को शनि प्रदोष व्रत करेगा जीवन की रुकावटों को दूर


शनि देव को मनाने के लिए 26 मई 2018 को ज़रूर करें शनि प्रदोष व्रत, भगवान् शनिदेव को खुश करने के लिए यह व्रत बहुत ही फलदायी होगा। सभी प्रदोष व्रतों में से सबसे महत्वपूर्ण माना जाने वाला शनि प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति के जीवन की सारी मुश्किलें, कठिनाइयां और रुकावटें ख़त्म होगी और शनि का प्रकोप, शनि की साढ़ेसाती या ढैया का भी प्रकोप भी कम होगा।

क्या आपको पता है कि ग्रहों में शनिदेव को कर्मों का फल देने वाला ग्रह कहा जाता है और यह एकमात्र ऐसे देवता होते हैं जिनकी पूजा-अर्चना कई लोग डरकर करते हैं। लेकिन शनिदेव न्याय के देवता हैं वो लोगों के कर्मों के हिसाब से फल देते हैं।

कल के दिन सुबह उठकर नहाकर शिवजी की पूजा-अर्चना करें और पूरा दिन निराहार व्रत रखें। शाम 4:30 से लगभग 7 बजे के बीच पूजा का मुहूर्त है क्योंकि शाम के वक़्त जब सूर्य अस्त होता है और रात का आगमन होता है तो इस वक़्त को प्रदोष काल कहते हैं और माना जाता है कि इस वक़्त शिव जी साक्षात शिवलिंग पर अवतरित होते हैं। इसलिए पूजा के लिए यह वक़्त चुना गया है और ध्यान रहे कि शाम के पूजा के पहले भी एक बार ज़रूर स्नान करें। इस वाट पूजा करने से इसका फल उत्तम मिलता है। इसके साथ ही साथ पूजा घर की अच्छे से सफाई करे, पांच रंगों की रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें, साथ ही साथ एक कलश में गंगाजल रखें, अगर गंगाजल ना हो तो आप साफ़-शुद्ध जल रखें। ‘ऊं नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिवजी को जल अर्पित करें और शिवजी की आरती करें।

इन सबके अलावा अगर आप हवन कर रहे हैं तो हवन की सामाग्री को मिलाकर 11, 21 या 108 बार ‘ऊं ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा’ का जाप करते हुए हवन में आहुति दें। साथ ही साथ शनि प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनाए। इस दिन सिर्फ मीठा भोजन करें और शुद्ध और स्वच्छ मन से भगवान् को याद करें।

जानिए क्या है शनि प्रदोष व्रत कथा ?

कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक सेठ और सेठानी थे, जिनके पास सबकुछ था और वो हमेशा दूसरों की चिंता करते थे सबको दान-दक्षिणा देते थे लेकिन सबकुछ होते हुए भी वो दुखी थे क्योंकि उनके पास कोई संतान नहीं थी। इसी कारण एक दिन सबकुछ छोड़कर वो तीर्थयात्रा पर निकल पड़े, यात्रा के दौरान वो थोड़ी दूर गए ही थे कि उन्होंने एक बड़े पेड़ के नीचे एक समाधिलीन साधू को देखा और उन्हें देखते ही दोनों पति-पत्नी साधू के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने का इंतज़ार करने लगे, लेकिन उनका ध्यान नहीं टुटा और सुबह से रात हो गई और वो दंपत्ति उनके सामने वैसे ही हाथ जोड़कर बैठे रहे। अगले दिन जब साधू समाधि से उठे तो उस पति-पत्नी को मुस्कुराकर आशीर्वाद देते हुए कहे कि 'मैं तुम्हारे मन की बात समझ गया हूँ और तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से बहुत खुश हूँ ' और उसके बाद उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि और शंकर भगवान की वन्दना बताई।

फिर वहाँ से लौटने के बाद दोनों ने नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे और फिर एक दिन सेठ की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया और आगे सुखी जीवन व्यतीत करने लगे।

सच्चे मन से नियमपूर्वक शनिदेव की पूजा करने से उसका फल ज़रूर मिलता है। 

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