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सात वित्तीय (financial) समस्याएँ जो शिशु के जन्म के बाद सामने आती हैं


शिशु के आने के साथ ही आपके खर्चे भी बढ़ते हैं। आप चाहते हैं जन्म लेने के बाद आपका शिशु स्वस्थ और खुश रहे और जब जरूरत हो तो आप पैसे खर्च करने में संकोच नहीं करते हैं। यद्यपि यह महत्वपूर्ण है और कई मामलों में पैसे खर्च करना जरूरी भी होता है। नए माता-पिता कुछ ख़र्चों का पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं और कई बार यह खर्चे उन्हें चौंका सकते हैं।

कई वित्तीय समस्याओं को माता-पिता आसानी से अनदेखा कर देते हैं क्योंकि उन्हें इन ख़र्चों की कोई जानकारी नहीं होती है। ऐसी स्थिति में यह और भी आवश्यक हो जाता है की वह किसी ऐसे व्यक्ति की सलाह लें, जो इस प्रक्रिया से गुज़र चुके हैं और इसमें कितना ख़र्चा आएगा यह जानते हैं।

यह है, कुछ वित्तीय समस्याएं जो शिशु के जन्म के बाद सामने आती हैं।

1. डिलीवरी का ख़र्चा

यह इस बात पर निर्भर करता है की आपकी डिलीवरी किस प्रकार होती है। उसके अनुसार इसमें आने वाला खर्च अलग-अलग हो सकता है। सामान्य डिलीवरी और (caesarian section) यानी सर्जरी द्वारा की जाने वाली डिलीवरी में बहुत फर्क होता है। अगर आप डिलीवरी की लागत पर विचार करते हैं, तो आपको बता दें अधिकतर माता-पिता कई प्रकार के मेडिकल ख़र्चों को ध्यान में रखना भूल जाते हैं जैसे दवाईयां और इंजेक्शन, जो डॉक्टर आपको खरीदने के लिए बोल सकते हैं।

2. स्वास्थ्य बीमा

माता-पिता की धारणा होती है की स्वास्थ्य बीमा में सभी मेडिकल खर्चे सम्मिलित होते है, लेकिन ज़रुरी नहीं है की यह सच हो। बीमा कम्पनियां इस बात की सावधानी बरतती है और सुनिश्चित करती हैं की उन्हें आवश्यकता से एक रुपए अधिक खर्च ना करना पड़े। ऐसे मामलों में माता-पिता को खुद कुछ खर्च उठाने पड़ सकते है।

3. शिशु के लिए ख़रीददारी

 शिशु के जन्म के बाद उसे कई सारी चीजों की आवश्यकता होती है। चाहे वह डाइपर हो या कोई अन्य आकस्मिक ख़र्चा। माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए की शिशु के जन्म से पहले वह ज्यादा ख़रीददारी ना करें और इस बात को भी सुनिश्चित करें की वह अपने शिशु के जन्म के बाद वही सामान खरीदे, जो जरूरी हो।

4. अवैतनिक छुट्टियां

हालांकि मैटरनिटी लीव यानी माँ को दी जाने वाली छुट्टियो को लेकर, अब कई कम्पनियां काफी उदार है। लेकिन पिता को छुट्टियां मिलना इतना आसान नहीं है। तो माता-पिता को अवैतनिक छुट्टियां लेने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि यह आसान नहीं है की एक ही माता-पिता अकेले शिशु का ध्यान रख सकें।

5. शिशु की देखरेख यदि माता-पिता दोनों कामकाजी है, तो इस बात की पूरी संभावना होती है की वह शिशु की देखभाल के लिए एक नैनी यानी आया को रख सकते हैं। शिशु का ध्यान रखना एक असाधारण ज़िम्मेदारी है और यह एक बड़े खर्चे के साथ आती है। अक्सर माता-पिता ख़र्चों को जोड़ते समय इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं और बाद में कई समस्याओं का सामना करते हैं।

6. बील

 यह बहुत मामूली पहलू लगता है और इसलिए अधिकतर माता-पिता इस पर ध्यान देने का विचार करते ही नहीं है। शिशु के जन्म के बाद आप अधिक बिजली का इस्तेमाल करते हैं, आप सफाई के लिए अधिक पानी का इस्तेमाल करते हैं और किराने या ग्रोसरी का बील भी बढ़ जाता है। यह मामूली लगने वाले खर्चे बढ़ जाते है, जो आपको महसूस नहीं होता है।

7. परामर्श (काउन्सलिंग) 

 चाहे काउन्सलिंग दंपति की हो या डिलीवरी के बाद की, इसमें ख़र्चा आता ही है और यह परिवार के ख़र्चों में जुड़ता है। अधिकतर दंपति यह सोचते हैं कि उन्हें काउन्सलिंग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और इसलिए वह इसे खर्च की गिनती में शामिल नहीं करते हैं। अक्सर शिशु हर छोटी चीज के प्रति संवेदनशील होते हैं, वह बीमार पड़ते हैं और उन्हें सलाहकार और बाल-रोग विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। यहां तक की दंपतियों को भी काउन्सलिंग की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि शिशु को बिना किसी बाहरी सहायता के संभालना बहुत तनावपूर्ण हो सकता है।

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