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वर्ल्ड हाइपरटेंशन डे - प्रेगनेंसी के दौरान हाइपरटेंशन का असर और कैसे करें बचाव


आज वर्ल्ड हाइपरटेंशन डे पर हम इस ब्लॉग के ज़रिये प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले हाइपरटेंशन के बारे में आपको बता रहे हैं। हाई ब्लड प्रेशर का ही दूसरा नाम है हाइपरटेंशन, जो कि गर्भावस्था के दौरान महिला और उसके शिशु के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो सकता है। प्रेगनेंसी के दौरान महिला को अपना ख़ास ध्यान रखना होता है क्योंकि इस वक़्त महिला में बहुत से शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं और इसी कारण महिला कभी-कभी बहुत ज़्यादा तनाव से घिर जाती है जिस कारण उन्हें उच्च रक्तचाप की समस्या का सामना करना पड़ सकता है । हाइपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर की परेशानी गर्भवती महिला के लिए दिल की बीमारी का सबब बन जाता है, जो कि गर्भ में पल रहे शिशु को भी नुकसान पहुंचा सकता है। आज इस ब्लॉग के ज़रिए हम बता रहे हैं कि क्यों गर्भवती महिलाएं हाई ब्लड प्रेशर या हाइपरटेंशन की परेशानी से गुज़रती है, इससे उन्हें किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है और इससे बचने का उपाय क्या हो सकता है।

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन के प्रकार

 

1. जेस्टेशनल हाइपरटेंशन

कई बार अगर गर्भवती महिला गर्भावस्था के 20वें हफ्ते से या उसके ख़त्म होने के बाद हाइपरटेंशन से गुज़र रही है तो उसे जेस्टेशनल हाइपरटेंशन कहते हैं। हालांकि कुछ मामलो में यह परेशानी डिलीवरी के बाद ख़त्म भी हो जाती है, लेकिन फिर भी बेहतर यह है कि आप इस समस्या के बारे में अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं।

2. क्रोनिक हाइपरटेंशन

यह वो अवस्था होती है जब बीपी हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ी रहती है। अगर महिलाएं पहले से ही हाइपरटेंशन से गुज़र रही है तो यह समस्या गर्भावस्था के दौरान भी रहती है और इसे क्रोनिक हाइपरटेंशन कहते हैं। बेहतर होगा कि इस दौरान आप रेगुलर अपने डॉक्टर से चेकअप कराते रहें।

3. क्रोनिक हाइपरटेंशन के साथ सुपरइंपोस्ड प्रीक्लैंपसिया

अगर किसी महिला को पहले से क्रोनिक हाइपरटेंशन की परेशानी हो और उसे प्रेगनेंसी के दौरान सुपरइंपोस्ड प्रीक्लैंपसिया हो जाए। एक तरह से यह क्रोनिक हाइपरटेंशन का दूसरा प्रकार होता है और गर्भावस्था के दौरान यूरिन में प्रोटीन होने से यह परेशानी होती है।

 हाइपरटेंशन होने के कारण

- सही डाइट ना होना या ज़्यादा नमक खाने से यह परेशानी हो सकती है।

- अगर पहली बार महिला गर्भधारण कर रही है तो भी यह हो सकता है।

- वज़न का ज़्यादा होना भी एक कारण है।

- अगर महिला 30 से ज़्यादा उम्र में गर्भवती हो रही हैं तो भी हाइपरटेंशन की समस्या हो सकती है।

- ज़्यादा चिंता या तनाव लेना भी हाइपरटेंशन के परेशानी का एक प्रमुख कारण है। 

शिशु पर हाइपरटेंशन का प्रभाव

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन से माँ से ज़्यादा असर शिशु पर होता है, इसके कारण शिशु के विकास पर काफी असर पड़ सकता है। इससे शिशु के दिमाग पर असर पड़ सकता है, शिशु विकलांग या अन्य कई बिमारियों का भी शिकार हो सकता है। इसके अलावा गर्भवती महिला मिसकैरेज का भी सामना कर सकती है और सिर्फ गर्भ में पल रहे शिशु की जान ही नहीं खतरे में पड़ सकती है बल्कि गर्भवती महिला के जान को भी खतरा हो सकता है।

हाइपरटेंशन के लक्षण

सिरदर्द

गर्भावस्था के दौरान कभी-कभी सिरदर्द होना आम बात है लेकिन यही अगर लगातार हो रहा हो तो यह हाइपरटेंशन के लक्षण हो सकते हैं, इसलिए बिना देर किये हुए एक बार डॉक्टर से ज़रूर संपर्क करें।

गुस्सा आना या तनाव महसूस करना

प्रेगनेंसी में मूड स्विंग गर्भावस्था के कुछ लक्षणों में से एक है लेकिन अगर आपको ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सा आ रहा हो या आप तनाव महसूस कर रही हैं तो यह भी हाइपरटेंशन के लक्षण हो सकते हैं।

थकान या आलसपन महसूस करना

ऐसे तो गर्भावस्था के दौरान थकान और आलसपन होना लाज़मी है लेकिन अगर यह ज़रूरत से ज़्यादा हो रहा है तो यह हाइपरटेंशन का कारण हो सकता है।

सूजन

गर्भावस्था के दौरान हाथ-पैरों में सूजन होना सामान्य है लेकिन यही अगर बढ़ जाए और लगातार रहे तो यह हाइपरटेंशन के लक्षण हो सकते हैं।

हाइपरटेंशन कम करने के उपाय

- रेगुलर अपने डॉक्टर से चेकअप कराते रहें।

- स्वस्थ आहार लें

-नमक का सेवन कम करें

- डॉक्टर से परामर्श करके एक्सरसाइज, योगा या मेडिटेशन का सहारा लें

-तनाव-चिंता से दूर रहें और खुश रहें

एक स्वस्थ शिशु को जन्म देने के लिए होने वाली माँ का स्वस्थ होना बहुत ज़रूरी है और इसके लिए उन्हें खुद का ध्यान रखना आवश्यक है इसलिए प्रेगनेंसी के दौरान शरीर में होने वाले किसी भी तरह के बदलाव को नज़रअंदाज़ ना करें। रेगुलर अपने डॉक्टर से संपर्क में रहे और उन्हें अपनी परेशानियों को बताएं और उनसे सलाह-परामर्श करें।

हैप्पी प्रेगनेंसी ! 

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