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क्या शादी के बाद पहनावा बदलना स्त्रियों की मज़बूरी - यह कैसा न्याय?


शादी एक बहुत ही गहरा बदलाव होता है। सारे अपने बेगाने लगने लगते हैं।पर क्या यह बदलाव आपकी ज़िन्दगी के साथ आपको भी बदलने लगता है?

सही मायने में हमें अंदाज़ा भी नहीं लगता कब हम बदल गए।

कैसे और कब यह बदलाव आता है?

यह बदलाव उस दिन से शुरू हो जाता है जब आपका रिश्ता किसी के साथ पक्का हो जाता है। दरअसल शुरुआत में इतनी चीज़ें होती है जैसे नए लोग, नए रीती-रिवाज़ आदि की हमारा ध्यान खुद पर जाता ही नहीं। हम यह बदलाव की शुरुवात को समझ ही नहीं पाते। प्यार में, हम सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं फिर पहनावा तो बहुत छोटी चीज़ है। हम कब जीन्स - टॉप से सलवार कमीज या साड़ी पर आ जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता।

क्या ससुराल वाले हमसे यह नए पहनावे की उम्मीद रखते हैं?

जी हाँ, यह समाज ऐसा ढला हुआ है की हमसे शादी के बाद अलग पहनावे की उम्मीद रखी जाती है। वह कहते हैं की "बहुएं घर की मान होती हैं, इसलिए उनका पहनावा बदलना चाहिए " अरे ! जनाब, मान तब भी अपने पिता के थे और यह हमने बखूबी बना के भी रखा।मान के नाम पर आज़ादी छीन जाना, एक गलत तर्क है। आखिर बहु भी कभी एक बेटी थी और तब उसके पास वह सारी आज़ादी थी।

हमें बस यह ध्यान रखना चाहिए की पहनावा ऐसा हो की किसकी की भावनाहीओं को ठेस न पहुचें।

बस फिर कहाँ कोई बंदिश।क्या किसी की ज़िम्मेदारियाँ उठाने, प्यार करने की कीमत यह होती है की आपसे आपकी आज़ादी छीन ली जाए।

शादी से पहले सारे ससुराल वाले यह दावा करते हैं की वह अपनी बहु को बेटी की तरह मानेंगे, फिर यह शादी के बाद कहाँ चला जाता है?

हर कोई यह चाहता हैं की उनकी बेटी को घर पर और सौरल में साड़ी आज़ादी मिले। फिर यह आज़ादी कहाँ चली जाती है जब बात बहुओं की आती है।

आइये हम समाज को यह बताएं की पहनावा एक स्त्री का निर्णय है और अधिकार भी, फिर वह शादी के पहले हो या शादी के बाद।


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