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कुछ इस तरह करें अपने शिशु की घुटने चलने में मदद

जब आपका शिशु रेंगना यानी घुटने चलना शुरू करता है, तो आप उनसे अधिक उत्साहित होते हैं! रेंगना एक महत्वपूर्ण विकास का मिल का पत्थर है क्योंकि यह नवजात शिशु का गतिशीलता की ओर पहला कदम होता है। शिशु रेंगने का प्रयोग घूमने और अपने आसपास के परिवेश को समझने के लिए करतें हैं। लेकिन सभी शिशु एक समान उम्र में रेंगना शुरू नहीं करते हैं।

शिशु क्यों रेंगते हैं?

नौ महीने की औसतन उम्र में नवजात शिशु रेंगना शुरू कर देते हैं। जबकि कुछ शिशु जल्द यानि की सात महीने की उम्र में यह शुरू कर देते हैं, और कुछ यह कौशल अपने पहले जन्मदिन से शुरू करते हैं। कुछ मामलों में रेंगना रातों-रात नहीं होता है, और इसकी श्रेणी और स्तर होते हैं जो रेंगने की ओर बढ़ता है।

शिशु रेंगना कैसे सीखते हैं?

प्रथम स्तर - दो महीने में सर ऊपर रखना: रेंगने की ओर पहला कदम पेट के बल लेटे होने के दौरान उठाने की क्षमता होती है। एक शिशु दो महीने की उम्र में यह कौशल विकसित करता है, जब उसके गर्दन की मांसपेशियों में गुरुत्वाकर्षण के विपरित कार्य करने की शक्ति होती है।

दूसरा स्तर - चार महीने में अपनी बाहें धकेलना: एक बार जब नवजात शिशु सर ऊपर उठाने लगता है, उसके बाद वह अपनी बाहों के साथ परीक्षण करता है। पेट के बल लेटने के दौरान, नन्हा मुन्ना कोहनी को फर्श पर टिकाने की कोशिश करता है।

तीसरा स्तर- छह महीने में शरीर के वज़न को संभालना : एक बार जब छह महीने का शिशु शरीर फर्श से ऊपर उठाता है और सभी चार अंग (हाथों और पैरों के घुटनों) पर अपना वज़न संभालता है। यह लगभग रेंगने की स्थिति में परिवर्तित होने जैसा होता है। छह महीने में ही शिशु खुद बैठ सकता है और इधर-उधर घूमने लगता है।

चौथा स्तर - आठ महीने में धीरे धीरे रेंगना: इसका मतलब होता है कि शरीर को आगे की ओर खींचना, जबकि पेट और टांगों को साथ में आगे की ओर बढ़ाना। यह गतिविधि संकेत करती है की शिशु रेंगने के लिए तैयार हैं।

पांचवां स्तर- नौ महीने में रेंगना: शिशु की मांसपेशियों में चार अंगों के बल पर शरीर हिलाने की क्षमता होती है। इसका मतलब होता है कि शिशु अब रेंगने के लिए तैयार हैं।

रेंगने के विभिन्न प्रकार

शिशु नीचे बताए गए किसी भी तरीके को अपना सकता है:

क्रॉस क्रौल - यह रेंगने का सामान्य तरीका है, जहां शिशु वज़न अपने हाथों और घुटनों पर उठाता है, अपने हाथ और उसके विपरीत घुटने आगे करना और आगे की ओर बढ़ता है। इस तरीके को क्लासिक क्रौल और क्लासिक हैंड और नी कहा जाता है।

बीयर क्रौल - यह क्रॉस क्रौल की तरह है, इसमें सिर्फ इतना अंतर है कि शिशु अपने पाँव आगे की ओर खींचता है और घुटनों की अपेक्षा अपने पैरों पर आगे बढ़ता है, जैसे की भालू।

क्रैब क्रौल - क्रोस क्रौल की ही तरह, यहां अंतर यह है कि शिशु रेंगने के दौरान शरीर को पीछे या बगल में ले जाता है‌।

कमांडो क्रौल - शिशु का पेट फर्श छूता है, और साथ ही विपरीत दिशा में हाथ और पांव रखते हुए आगे बढ़ता है। चूंकि यह रेंगने का तरीका उसी से मिलता जुलता है, जो फौजियों को सिखाया जाता है, इसलिए इसे कमांडो क्रौल कहा जाता है।

शिशु को रेंगने में मदद किस प्रकार से करें?

शिशु को रेंगने के लिए प्रोत्साहित करना आसानी से घर पर किया जा सकता है। नीचे दिए गए उपाय मददगार साबित हो सकतें हैं।

नियमित रूप से पेट के बल रहें क्योंकि यह अकेली ऐसी गतिविधि हैं जिसके कई फायदे हैं। यह आपके शिशु के शरीर के लगभग हर अंग को मजबूत प्रदान करता है, रेंगने जैसे जटिल गतिविधि को आसान बनाता है। एएपी हर दिन कम से कम पांच मिनट के लिए प्रत्येक सत्र के साथ पेट के दो से तीन सत्रों का सुझाव देता है। जैसे ही शिशु बढ़ता है, पेट के बल रहने का समय भी बढ़ा देना चाहिए।

शिशु की जिज्ञासा बढ़ाए और उन्हें वस्तु तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करें। मोटर कौशल को बढ़ाने के लिए इस जिज्ञासा का अहम हिस्सा होता है। माता-पिता वस्तु को बच्चे के आस-पास रख सकते हैं और फिर अपने बच्चे को उस तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। इससे शिशु में अपने शरीर को आगे बढ़ाने की तीव्र इच्छा जागृत होती है, परिणामस्वरूप शिशु रेंगने के लिए प्रेरित होता।

उन्हें बैठाएं क्योंकि बैठने से कमर की मांसपेशियों में सहयोग करने की क्षमता बेहतर होती है। जब शिशु छह महीने का हो जाए, उन्हें बैठाने की स्थिति में बैठाएं और उन्हें कुछ मिनट तक उस स्थिति में बैठने दें। इस गतिविधि को रोज़ दोहराएं।

रेंगना महत्वपूर्ण है, बेशक शिशु का घर में यूं ही घूमना अजीब लगे! फिर भी, रेंगने से शिशु को आगे की ओर बढ़ने और यह नवजात शिशु में रेंगने का कौशल बेहतर बनाने में बहुत आवश्यक होता है।

शिशु के लिए रेंगना दिलचस्प बनाएं , एक बार जब आपका बच्चा पूरी तरह से क्रौलर बन जाए। खिलौने छिपाएं और शिशु के साथ पिक-ए-बो खेलें और इस बात को सुनिश्चित करें कि शिशु सही तरह से रेंगे। अगर किसी भी क्षण में शिशु रुकता या गिरता है, तो उसे प्यार से गले लगाएं और उन्हें फिर से रेंगने दें।

यह विभिन्न गतिविधियाँ रेंगने के विकास में विभिन्न स्तरों को प्रेरित करने में मदद करतीं हैं। 

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