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सिर्फ माँ को ही नहीं बल्कि शिशु को भी प्रभावित करता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन - जानिए कैसे


महिलाएं गर्भावस्था के दौरान बहुत अधिक भावनात्मक उतार-चढ़ाव से गुजरती है। उन्हें सहयोग और सहारे की आवश्यकता होती है, न केवल गर्भावस्था के नौ महीने के दौरान बल्कि डिलीवरी के बाद भी। शिशु को जन्म देने की प्रक्रिया अद्भुत है लेकिन यह चुनौती पूर्ण भी है। और जब बात जिंदगी में होने वाले बदलाव की आती है तो इसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू शामिल होते हैं। शिशु के जन्म के बाद मां की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है और उनपर ज़िम्मेदारियां भी बढ़ जाती है। नए बदलाव न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी होते हैं और इसलिए कई बार माता-पिता तनावग्रस्त हो जाते हैं और उनके लिए इस नई स्थिति को अच्छी तरह से संभाल पाना मुश्किल होता है। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में वह पोस्टपार्टम डिप्रेशन से जूझने लगती है 

कैसे बचा जाए पोस्टपार्टम डिप्रेशन से?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बचाव और उभरने के लिए यह बहुत ही आवश्यक है कि आप पोस्टपार्टम डिप्रेशन की स्थिति के दौरान मां की मदद करें अर्थात् डिलीवरी के बाद उन्हें सहयोग दें ताकि वह डिप्रेशन में जाने से बच सकें क्योंकि इसका प्रभाव ना सिर्फ माँ बल्कि शिशु पर भी पड़ता है । मां को भी सारा काम अपने ऊपर लेने की जगह किसी और से मदद लेने की जरूरत को समझना चाहिए। अपने परिवार और थैरेपिस्ट से बात करें और अपनी भावनाओं और एहसास को अपने अंदर ही दबाकर न रखें।

पुरुषों पर भी होता है इसका प्रभाव

हाल ही में लोगों ने पोस्टपार्टम डिप्रेशन और उससे जुड़ी भावनाओं को लेकर ज्यादा खुलकर बात करना शुरू किया है। इस समस्या को वर्षों से यह कहकर टाला जाता था कि यह नियमित रूप से होता है और इसपर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह मुद्दा प्रचलित हुआ है। परन्तु, यह अब भी एक ग़लतफ़हमी है कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन सिर्फ मां को प्रभावित करता है।

लेकिन वह लोग इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करते हैं कि अपने साथी की गर्भावस्था में पुरुषों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है और इसलिए पुरुषों को भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन का उतना ही ख़तरा होता है, जितना की महिलाओं को।‌ हालांकि यह महिलाओं में आम हैं परन्तु कुछ मामलों में यह पिता को भी प्रभावित करता है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण:

माता और पिता में पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण लगभग आम होते है। इसमें चक्कर आना, चिड़चिड़ापन आदि शामिल हैं। यह लक्षण मुख्यतः शिशु के जन्म के एक महीने बाद दिखाई पड़ते हैं। इसमें इस बात की भी संभावना होती है कि अगर माता-पिता में से कोई एक इससे प्रभावित है, तो दूसरा भी इससे प्रभावित होगा और इसी कारण इससे बच्चे भी प्रभावित होते हैं।

बच्चों पर इसका प्रभाव:

बच्चों के चीजों को ग्रहण करने और अनुसरण करने की क्षमता के कारण उनके व्यवहार, भाषा और कौशल पर इसका प्रभाव पड़ता है । हालांकि यह सकारात्मक पहलू है लेकिन इसके कई दुष्प्रभाव भी होते हैं। इससे डिप्रेशन के कारण होने वाली बेचैनी, चिड़चिड़ापन, असहजता और भावनात्मक दबाव उन्हें अधिक प्रभावित करते हैं ।

यह कहना उचित होगा कि यह उनके व्यवहार में समाहित हो जाता है और अगर समय रहते इसपर ध्यान न दिया जाए तो, स्थिति और ख़राब हो सकती है। जिन बच्चों के माता-पिता डिप्रेशन के शिकार होते हैं उनके बच्चों को भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्या होने की संभावना अधिक होती है। हाल ही में आए अध्ययन में पाया गया है कि बच्चों में पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण दिखने में वर्षों लगते है और उसमें गुस्सा, अल्कोहल का सेवन, नशीले पदार्थ का सेवन, एडीएचडी आदि शामिल है।

इन सभी नकारात्मकता के साथ ही यह बहुत आवश्यक है कि पोस्टपार्टम से गुजरने वाले माता-पिता का सहयोग किया जाए। पोस्टनेटल स्क्रिनिंग से डाक्टर को पोस्टपार्टम से गुजरते माता-पिता की काउंसलिंग करने का मौका मिलता हैं। इस तरह के कार्यक्रमों का प्रभाव बेहतर होता है और इसका उद्देश्य पोस्टपार्टम डिप्रेशन से जूझते माता-पिता की मदद करने से कहीं अधिक है।

माता-पिता बच्चों को पालने-पोसने से कहीं अधिक योगदान देते हैं। वह वैज्ञानिकों, कामकाजी नागरिकों और नेताओं की पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन का उपचार किया जाए और इस समस्या को गंभीरता से लेकर इसका समाधान निकाला जाए। 

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