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जन्म से पहले की स्मृति : क्या लोगों को गर्भ में रहना याद होता है? जन्म याद होता है?


वर्जिनिया यूनिवर्सिटी स्कूल आफ मेडिसिन ने जन्म से पूर्व की यादों का वर्णन किया है: कुछ छोटे बच्चों ने अपने जन्म के दौरान और जन्म के पूर्व की यादों के बारे में बताया है। जन्म से पहले की यादों के मामले में कुछ ने बताया है की वह उस घटना के बारे में जानते हैं जो गर्भ में हुई थी। जबकि अन्य स्वर्ग या किसी और जगह होने वाली घटनाओं के बारे में बात कर रहे थे।

“कभी-कभी छोटे बच्चे अपने जन्म की प्रक्रिया के हिस्सों के बारे में बताते हैं,जो उनके माता-पिता कहते हैं की उन्होंने उन्हें नहीं बताया है। हालांकि वर्तमान में शिशु की स्मृतियों की समझ,इस तरह की यादों को संभव नहीं मानती है। लेकिन कुछ बच्चे इसका वर्णन करते है।

वैसे विज्ञान ने इसे समझने में कुछ प्रगति की है की कैसे हम यादों को संजोते है और याद करते है। यादों के बारे में अधिकतर चीजें रहस्य ही रहती है।

मां-शिशु का मस्तिष्क संबंध?

इमोरी यूनिवर्सिटी में एक टिम द्वारा अध्ययन किया गया और शोधकर्ताओं ने एसिटोपोनोन एक फलों सी खुशबू जो चैरी में इस्तेमाल की जाती है,जास्मिन,शहद और बादाम का स्वाद, से डरने के लिए चूहों को प्रशिक्षित किया। खुशबू को अनुभव करते ही चूहों को इलैक्ट्रिक शौक मिलता था,इससे खुशबू के साथ दर्दनाक संबंध जुड़ेगा। इस टेस्ट का परिणाम यह निकला की चूहिया का बच्चा जिसने वह खुशबू कभी नहीं सूंघी थी, उसने भी उस महक के प्रति बहुत डर और भय की प्रतिक्रिया दी।

चूहिया के बच्चे के मस्तिष्क में उन्हीं न्यूरोन में वृद्धि हुई, जिनमें चूहिया के मस्तिष्क में हुई थी। उनकी नाक इस विशेष गंध के प्रति ज्यादा संवेदनशील थी यहां तक की तीसरी पीढ़ी भी प्रभावित हुई। जिस प्रकार चूहिया के बच्चे में यह भयानक प्रतिक्रिया पैदा हुई,उसी प्रकार मानव माताओं के गर्भ में शिशु के पास किसी प्रकार से उनके जीवन की कुछ यादे चली जाती है।

जन्म से पहले की कुछ यादें अनुभव होती है, गर्भ के बाहरी परिप्रेक्ष्य की। व्यक्ति को यह याद रहता है की वातावरण कैसा था।कुछ गर्भ के परिप्रेक्ष्य से अधिक स्पष्ट होता है। ऐसी ही एक अनुभव है “ जब मैं छोटी थी तो मैंने अपनी मां को एक याद के बारे में बताया, मुझे एक गर्म, अंधेरे और तंग जगह पर रखा गया था। वहां लगातार एक शांत थपथपी गुंज रही थी।”

“ मैं अपनी मां की गोद में था,जब वह मेरे जन्म के बाद वीलचेयर से अस्पताल से बाहर जा रही थी।”

ऐसे ही कई अनुभव लोगों ने साझा किए हैं। विषेशज्ञों का मानना है की इस तरह की स्मृतियां काल्पनिकता से बनती है और वास्तविक स्मृतियां 18 महीने के बाद ही संभव होती है।

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