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जानिए प्रेग्नेंसी में कराएं जाने वाले महत्वपूर्ण टेस्ट के बारे में

 

गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला को कई बदलावों से गुजरना पड़ता है और ऐसे में मां व बच्चे की सुरक्षा के लिए डॉक्टर विभिन्न तरह के टेस्ट करवाते हैं ताकि यह जाना जा सके कि गर्भ में पल रहे भ्रूण का विकास उचित प्रकार से हो रहा है या नहीं। ऐसे में जो कुछ प्रमुख टेस्ट किए जाते हैं, उनकी जानकारी यहां दी गई है। आइए जानते हैं मां के लिए कौन-कौन से टेस्ट जरूरी है।

लेख की विषयसूची

गर्भावस्था के दौरान कराए जाने वाले टेस्ट

पहले से तीसरे महीने में टेस्ट

चौथे से छटे महीने में टेस्ट

डाइट का रखें खास ख्याल

गर्भावस्था के दौरान कराए जाने वाले टेस्ट

अगर आप पहले से गाइनिकॉलजिस्ट से कंसल्ट नहीं कर रहे हैं तो प्रेग्नेंसी का पता चलते ही किसी अच्छे गाइनिकॉलजिस्ट के पास रजिस्ट्रेशन कराएं। मां बनने वाली महिला की सेहत के हिसाब से डॉक्टर अलग-अलग तरह के टेस्ट करते हैं लेकिन फिर भी हीमोग्लोबिन, कैल्शियम, ब्लड शुगर, यूरिन और एचआईवी टेस्ट यह ज़रूर करवाना चाहिए। यह टेस्ट हर तीन महीने में कराए जाते हैं।

कोई परेशानी नहीं हो तो अल्ट्रासाउंड आमतौर पर तीन बार कराया जाता है। दूसरे महीने में बच्चे की धड़कन जानने के लिए, चौथे महीने में बच्चे का विकास देखने के लिए और आखिरी महीने में बच्चे की स्थिति देखकर डिलीवरी प्लान करने के लिए। अगर डॉक्टर को जरूरी लगता है, तो वह इस दौरान कभी भी अल्ट्रासाउंड करा सकते है।

पहले से तीसरे महीने में टेस्ट

शुरुआती महीनों में मिर्गी, हाइपोथायरॉइड और थैलीसीमिया के लिए भी जांच कराई जाती है। अगर पैरंट्स में थैलीसीमिया के लक्षण होते हैं तो बच्चे में इससे पीड़ित होने की आशंका 25 फीसदी बढ़ जाती है। जांच में अगर बच्चा इन्फेक्टिड पाया जाता है तो उसे अबॉर्ट करना ही बेहतर होता है।

शुरू के तीन महीनों में मासिक जांच अधिकतर की जाती है। कोई परेशानी होने पर 15 दिनों के भीतर भी जांच की जाती है। बच्चे के 28 हफ्ते का होने पर दो हफ्ते में एक बार चेकअप कराना जरूरी होता है।

चौथे से छटे महीने में टेस्ट

-चौथे से पांचवें या पांचवें से छठे महीने में मां को टिटनेस का टीका लगाया जाता है।

- सोनोग्राफी खुद न कराएं। जब डॉक्टर बताए, तभी सोनोग्राफी कराएं। हालांकि इससे बच्चे को कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन इस दौरान एक्स-रे से ज़रूर बचना चाहिए क्योंकि ये किरणें बच्चे को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

डाइट का रखें खास ख्याल

मां और बच्चे, दोनों की सेहत काफी हद तक डाइट पर निर्भर करती है। ऐसे में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन से भरपूर चीजें ज्यादा खानी चाहिए जैसे कि दालें, पनीर, अंडा, मांसाहार, सोयाबीन, दूध, पनीर, दही, पालक, गुड़, अनार, चना, पोहा, मुरमुरा आदि। फल और हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ खूब खाएं। शरीर में पानी की कमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए क्योंकि डिलीवरी के वक्त काफी खून की जरूरत पड़ती है और बच्चा भी फ्लूइड में रहता है, इसलिए नीबू पानी, नारियल पानी, छाछ, जूस खूब पिएं। बच्चे के दिमाग के विकास के लिए ओमेगा-3 और ओमेगा-6 बहुत जरूरी हैं। फिश लिवर ऑयल, ड्राइफ्रूट्स, हरी पत्तेदार सब्जियों और सरसों के तेल में यह भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

निष्कर्ष

गर्भावस्था के दौरान यह टेस्ट करवाना बहुत आवश्यक है। साथ ही पौष्टिक आहार और सही देखभाल के साथ आप अपनी और अपने गर्भ में पल रहे भ्रूण का उचित विकास सुनिश्चित कर सकती हैं।

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