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शिशु में पेट दर्द की समस्या को इन घरेलू नुस्खों से करें कम


नवजात शिशु को कुछ ना कुछ शारीरिक परेशानी लगी रहती है क्योंकि उनकी इम्यून पावर कमज़ोर होती है और इन्हीं कुछ शारीरिक परेशानियों में से एक है पेट का दर्द। कभी-कभी यह बहुत ज़्यादा कष्टदायक होता है और शिशु इसे बोल नहीं पाते और घंटो रोते रहते हैं और यह किसी भी माता-पिता के लिए बहुत ही मुश्किल वाली घड़ी होती है। शिशुओं में पेट दर्द एक आम समस्या है और यह कई कारणों से हो सकता है। यह बहुत ही तकलीफदेह हो सकता है और इसलिए बेहतर होगा कि आप भरोसेमंद घरेलू उपायों को आज़माकर अपने शिशु को थोड़ा आराम दें।

 

शिशुओं में पेट दर्द के कारण क्या है?

 

माता-पिता होने के नाते आप अपने शिशु का बहुत ध्यान रखते हैं लेकिन इसके बावजूद शिशुओं में पेट दर्द के अनेक कारण हो सकते हैं। इसके अहम कारणों की सूची इस प्रकार है:

संक्रमण - शिशु का प्रतिरक्षा तंत्र विकासशील होता है और इसलिए वाइरस इसे आसानी से प्रभावित कर सकते हैं। जाने-अनजाने में वयस्क व्यक्ति से यह संक्रमण शिशु को हो सकता है। रोटावायरस नवजात शिशुओं के बीच गेस्ट्रोएंटेट्रिस का कारण होता है और इससे पेट में दर्द के साथ-साथ उल्टी भी होती है। ऐसे और भी वाइरस हैं जैसे कि स्ट्रैप्टोकोक्स और एडेनोवाइरस जो आसानी से संक्रमित होते हैं।

फूड एलर्जी - शिशु को किस खाद्य पदार्थ से कैसी प्रतिक्रिया होगी यह हमें तब तक पता नहीं चलेगा जब-तक कि हम एक बार शिशु को उसका सेवन न कराएं। अधिकतर शिशु को नया खाद्य पदार्थ खिलाने से उन्हें वह पचाने में असहजता और तकलीफ़ महसूस होती है। यहां तक जो शिशु स्तनपान करते हैं उन्हें भी यह समस्या हो सकती है। इसका कारण वह खाद्य पदार्थ भी हो सकता है जो मां खाती है।

कोलिक - कोलिक उसे कहा जाता है जब शिशु बिना किसी कारण के घंटों तक रोता है। रोने से डायफग्राम में संकुचन होता है जिससे पेट में मरोड़ पड़ते हैं और दर्द होता है। शिशु को चुप कराने के आम तरीके उन्हें शांत कर सकते हैं। जैसे उन्हें गोद में लेना और शिशु को सैर पर ले जाना।

पिडियाट्रिक हर्नीया - हर्निया तब होता है जब आँत एब्डोमिनल कैविटी से फिसल जाए। इससे असहजता होती है और कभी-कभार इससे संक्रमण भी हो सकता है। हर्निया को लेकर ज्यादा परेशान न हों, यह आसानी से पता लगता है और कुछ समय में अपने आप ठीक हो जाता है। कुछ में बहुत दर्द भी हो सकता है इसलिए अपने बालरोग विशेषज्ञ से संपर्क करें।

गेस्ट्रोएसोफेगिल रिफ्लक्स - इसमें एसोफैगल स्पिंकचर सही तरह से बंद नहीं होता है और इससे खाना ऊपर आता है या परेशानी होती है। इससे खाना खाते ही उल्टी होती है और पेट में दर्द होता है। डॉक्टर इसके लिए भारी फार्मूला दे सकते हैं जिससे भोजन भारी हो और पेट की सतह पर रहे। यह अमूमन जन्म के पहले हफ्ते के बाद चला जाता है।

एपैनडिक्स - एपैनडिक्स एक एपैनडेज होता है जो हमारे शरीर सीधे तरफ के कोने से बड़ी आँत से जुड़ा होता है। चूंकि यह आखिरी टय़ूब होती है, इसलिए किसी भी खाद्य पदार्थ से इसमें अवरोध उत्पन्न होता है। इससे एपैनडिक्स में तेज़ दर्द होता है और शिशु रोना शुरू कर देता है। अगर यह समस्या हो तो डॉक्टर से फौरन संपर्क करें।

आंत में अवरोध - यह दो प्रकार के होते हैं, एक फिलोरिक स्टेनोसिस जहां पेट का निचला हिस्सा बड़ जाता है और छोटी आँत की ओर भोजन के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करता है। दूसरा है इंटूसूसेप्शन, जो कि एक दुर्लभ स्थिति है जहां आंत का एक हिस्सा दूसरे से लिपट जाता है और इससे गाढ़ा द्रव उत्पन्न होता है, जिससे अवरोध है। इन दोनों को सर्जरी से ठीक किया जाता है।

कब्ज़ - कब्ज़ शिशुओं में सामान्य बात है और इसका मतलब होता है कि बहुत ही सख्त मल जिसे निकलने में दिक्कत हो। इससे एब्डोमन में दर्द होता है।

गैस - शिशु की आंतें नई होती है और इन्हें उचित प्रकार से कार्य करने में समय लगता है। आंतों में गैस बैक्टीरिया के कारण हो सकती है, मां के द्वारा खाए जाने वाले कुछ भोजन के कारण यह स्तनपान के द्वारा हो सकता है या शिशु के हवा निगलने से भी हो सकता है।

शिशु में पेट दर्द के लक्षण क्या होते हैं?

आपके शिशु को पेट में दर्द हो सकता है अगर उनमें यह लक्षण दिखाई देते है:

बैठने में दिक्कत

दर्द दिखाने के लिए तरह-तरह के मुंह बनाना

चिड़चिड़ापन

बहुत अधिक रोना

उल्टी और दस्त

पेट पर हाथ लगाने से और अधिक रोना

गैस की समस्या

जब आप सुनिश्चित हो जाएं कि पेट में दर्द हो रहा है तो शिशु को शांत कराने के लिए घरेलू उपायों को ज़रूर आज़माए। शिशु को बिना डॉक्टर से सलाह लिए कोई भी दवाई न दें। इसके बजाए आप घर में तैयार की गई यह घरेलू उपाय दे सकती है।

अदरक - अदरक में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो डाइजेस्टिव जूस को बढ़ाते हैं और पेट के अम्ल को न्यूट्रलाइज करने में मदद करते हैं‌।

सेक लगाएं - गरमाहट से त्वचा की सतह पर रक्त प्रवाह बढ़ता है और दर्द कम होता है। इसे गर्म पानी की बोतल या हिटींग पैड के रूप में लगाया जा सकता है। आप अपने हाथ रगड़ कर इससे निकलने वाली गर्मी को पेट लगा सकते हैं। पहले लोग सरसों के तेल को गर्म करके पेट पर लगाते थे।

पिसा हुआ भोजन - अगर शिशु को दर्द के बावजूद भूख लग रही है तो घी चावल, दही या कुछ तरल पदार्थ दें। तला या भूना हुआ भोजन न दें क्योंकि इससे पेट में समस्या हो सकती है।

क्रैप डाइट - क्रैप डाइट का मतलब है कि चैरी, एपरिकौट, प्रूनेस जैसे खाद्य पदार्थ दें, जो आसानी से पच जाते हैं। यह कब्ज़ के दौरान बहुत मददगार होते हैं। आप बच्चों को आधे कप से कम मात्रा में यह दे सकते हैं।

दही - दही बहुत ही फायदेमंद होती है और यह पेट दर्द को शांत करने और अच्छे बैक्टीरिया उत्पन्न करने में मददगार साबित हो सकती है।

घरेलू उपाय बहुत ही लाभकारी साबित हो सकते हैं लेकिन बेहतर होगा कि आप अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

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