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गर्भ में शिशु को प्रभावित करती है, पिता की जीवनशैली - हैरान!! - जाने कैसे -

प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार गर्भावस्था में पति का पत्नी के साथ रहना, उसकी देखभाल करना और उसके मानसिक तथा भावनातकमक रूप से मदद करना उनके शिशु में अच्छे गुणों को पैदा करता है जैसे की शिशु में स्नेह, ममता, दया, मदद और पारोपकार। यह जाने अनजाने ही शिशु में आ जाते हैं।

जिन परिवारों में पति अपने पत्नी के कदम कदम पर साथ देते हैं वहाँ शिशु का वेट सामान्य होता है, उनमें प्रीमैच्योर डिलीवरी की शिकायत नहीं होती। पैदा होने के बाद वे अपने पिता के साथ घुलने मिलने लगते हैं। अपने पिता को पास पाकर शिशु खिल खिला कर हँसता है।

 

 

माँ के स्वास्थ्य का शिशु पर का असर पड़ता है इसपर अनेक रिसर्च की जा चुकी हैं। इसमें कोई हर्ज़ भी नहीं है क्योंकि शिशु अपनी माँ की कोख में 9 महीने रहता है। उसके खान पान और सेहत का असर शिशु पर पड़ता है। परन्तु पिता के योगदान को यूँही नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

पिता की उम्र कम होने से शिशु में मानसिक परिपक्वता थोड़ी कम हो सकती है। पिता की उम्र अधिक होने से उनके शरीर के रोग भी कभी कभी शिशु में आ जाते हैं।

पिता की औसत उम्र 26 से 33 वर्ष होने से वह पत्नी और शिशु की अच्छे से देखभाल कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त उनमें मानसिक परिपक्वता भी आ जाती है जिससे की वे किसी मुश्किल परिस्थिति को भी ठन्डे दिमाग से सुलझा पाते हैं। अगर पिता सूझबूझ से पत्नी की समस्याओं का समाधान करता है तो इससे पत्नी का आत्म- विश्वास बढ़ता है। वह भी शांत होकर एक काम पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। उसे किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उसका पति उसका साथ देगा।

पिता का शराब/सिगरेट न पीना, उसका स्वास्थ्य अच्छा बनाये रखने में मदद करता है। इस प्रकार शिशु सामान्य वज़न 2.7–4.1 किलो का पैदा होता है। 2.5 किलो से कम का शिशु लो बर्थ बेबी माना जाता है।

जो पति गर्भावस्था में अपनी पत्नी के साथ रहते हैं उनके बच्चे स्वतंत्र, निडर और बुद्धिमान पैदा होते हैं। वे मिलनसार होते हैं, दूसरे लोगों से बात चीत कर लेते हैं, उनके समक्ष अपने विचार प्रस्तुत कर पाते हैं, वाद-विवाद में अच्छे होते हैं, शिशु में आत्म-निर्भरता के गुण आते हैं। शिशु यह सब गुण अपने पिता से प्राप्त करता है।

पति का पत्नी का साथ देना पत्नी को सबल और दृढ़ माँ बनने में मदद करता है।

जिन महिलाओं के पति उनके शिशु की डिलीवरी के समय मौजूद नहीं थे उनमें मौत होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि मानसिक तनाव और घबराहट के कारण महिला के बदन में से ज़रूरी हॉर्मोन पैदा नहीं हो पाते और परिणामस्वरूप उनमें ज़रूरी संकुचन नहीं हो पाते। शिशु को जन्म लेने में दिक्कत होती है और इसके साथ ही वह मृत भी पैदा हो सकता है।

गर्भावस्था में पति अपनी पत्नी से झगड़ते है तो इसका भी महिला पर नकारात्मक असर पड़ता है। वह दुःखी , कुंठित, चिंतित होने के कारण आस पास वाले लोगो से बात करना कम कर देगी। मन ही मन घुटने से उसके काम पर असर पड़ेगा। घर का काम काज धीमा हो जायेगा और उसमें कई गल्तियाँ भी हो सकती हैं जैसे की खाना जलना, दूध उबलना, वाशिंग मशीन में कपड़े पड़े रह जाना, अखबार समय पर न लेना इत्यादि। महिला बीमार भी हो सकती है जैसे की हाई ब्लड प्रेशर, खून की कमी, कमज़ोरी या चक्कर आना।

 पिता का योगदान दिखाई न दें परन्तु रहता अवश्य है। पिता की जगह लेना नामुमकिन है। एक पति सफल परिवार का ऐसा आधार है जिसके बल पर घर के सभी लोग सुरक्षित और बेफिक्र रहते हैं।

अपनी पति की मदद को सदा सराहें और अपने पति को प्यार व समय दें। उन्हें आपका साथ पाकर अच्छा लगेगा।

अपने पति को टैग कीजिये और उनके साथ मातृत्व का मज़ा लें। क्या आप हैरान हैं?- हमें ज़रूर बताएं आपका अनुभव -और इसे शेयर करके लोगों को जागरूक करें -

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