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दिल ढूँढता है ...............


अल्हड से बचपन के वो दिन अक्सर याद आ जातें है ,

                       यादों की गलियों में फिर वो हरदम मुझे बुलाते है !

नमक मिर्ची की लिपटी अम्बियां कैसा रंग जमाते थे ,

सी -सी करते ,पानी पीते ,फिर खाने आ जाते थे !

                          अल्हड से बचपन के वो दिन अक्सर याद आ जातें है |

कित -कित ,कबड्डी और पिट्टो में अपना समय बिताते थे ,

मास्टर जी की मार से बचने के हमें बहाने आते थे !


अल्हड से इस बचपन को ठग कर यौवन दबे पाओं आया ,

अपने हाथ बढाकर उसने मेरा ,दुल्हन का श्रृंगार किया |

अलबेली सी दुल्हन बन गयी ,वो स्मृतियाँ भी प्यारी है ,

अपनी घर की रानी हूँ मैं ,फिर भी लगे कुछ खाली है !

                       रात -दिन की भागदौड़ में बचपन फिर याद आया तू ,

                      सुखी पलकें गीली हो गयी ,क्यों इतना मुझे सताया तू ?

गीली आँखे पोछ रही थी ,दिख गयी बिटिया मेरी ,

चटाई पर बैठी, किसी धुन में खोई थी दुनिया मेरी !

                    चुपके से जाकर देखा तो ,हाथ थे उसके रंगे हुए,

                    ड्राइंग की कॉपी थी खाली ,पैर चित्रकारी से भरे हुए !

लाल रंग की पेंसिल लेकर मेरा हाथ, थी वो मांग रही ,

बड़े अरमानो से, वो थी चेहरा मेरा, ताक रही |

                      हँस कर मैंने हाथ बढ़ाया ,गोद में भरकर बिठा लिया ,       

                      अपने बचपन को मैंने, संग फिर उसके खूब जिया !

अब बचपन को नहीं बुलाती ,बचपन को जी लेती हूँ ,

बिटिया के संग बच्चा बनकर मधुर रस मैं भी पी लेतीं हूँ !

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