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भारतीय संस्कृति में बच्चे के कान छिदवाने का अर्थ


बच्चों के कान छिदवाना कई सालों से चला आ रहा है । इसे फैशन स्टेटमेंट भी माना जाता है । इसके पीछे कई कारण हैं । हिन्दू मान्यता के अनुसार कर्णवेध क्रिया के तहत बच्चों के कान 3 से 5 वर्ष के बीच छिदवाने चाहिए ।

एक प्रमुख कारण है की बच्चे के कान छिदवाने से उनका कान हिन्दू मंत्र व श्लोक को बेहतर रूप से सुन व महसूस कर सकेगा । ईश्वर से उनका समबन्ध गहराता जायेगा । वे अपने शिक्षक, पंडित और माता-पिता की बात सफाई से सुन पाएंगे । कर्णवेध का ज़िक्र वेदों में किया गया है । हिन्दू धर्म में इसे पवित्र रीति मानते हैं । लड़कों का दायाँ और लड़कियों का बायाँ कान छेदा जाता है ।


ब्रह्मिणों में कर्णवेध को अनिवार्य रिवाज़ माना जाता है जिसे जीवन में एक बार करना आवश्यक है । कुछ धार्मिक समूहों में कर्णवेध को बड़े धूमधाम से मनाते हैं परन्तु इसे उपनयन से पहले करना चाहिये जो की एक पवित्र धागे का समारोह है ।

वैसे तो कर्णवेध को जन्म के कुछ दिनों के भीतर ही पूरा कर देना चाहिए क्योंकि वेदों में ऐसा ही कहा गया है । लेकिन स्वास्थ्य और संक्रमण सम्बंधित कारणों से इसे ताल दिया जाता है । डॉक्टर्स कहते हैं कि इसे बच्चे के 3 माह पूरे होने से पहले नहीं कराना चाहिए । क्योंकि इसी वक्त शिशु को उसका पहला डी.टी.पी टीका लगता है । इससे उनमें टेटनस तथा अन्य संक्रमणों का खतरा कम हो जाता है ।

कान छिदवाने के कई वैज्ञानिक लाभ भी होते हैं जैसे की तेज़ मानसिक विकास, मज़बूत दृष्टि क्योंकि कान की नसों का बुद्धि से गहरा जुड़ाव होता है । अपने आस-पास के वातावरण के प्रति बच्चे की संवेदनशीलता बढ़ती है । सो डॉक्टर्स भी कर्णवेध को बढ़ावा देते हैं ।

कुछ लोग सोनार के पास जा कर तो कुछ घर में खुद ही बच्चों का कान छेद देते हैं । बस ध्यान रहे की कोई गंभीर संक्रमण या बीमारी न फैले । आप साफ सुई से कान में छेद करें । पहले लोग कान में नीम की डंठल लगा देते थे पर अब लोग बच्चों को कान में बाली पहनाते हैं ।

तो आप कब अपने शिशु का कर्णवेध कब करवा रहे हैं ? इससे जुड़े सवाल हमें पूछिए । हम विशेषज्ञ की सलाह आप तक पहुचायेंगे ।

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