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भारत में शिशुओं से संबंधित रस्में और उनकी मान्यताएँ


भारत विभिन्न संस्कृतियों और मान्यताओं का देश है। हमारे देश में करोड़ों लोग हैं, जो इन मान्यताओं पर यकीन करते हैं और इन प्रथाओं को अपने बच्चों को सौंपते हैं, बिना इनका तथ्य जाने! क्यों? उनके लिए, जो भारत की कुछ संस्कृतियों के बारे में जानना चाहते हों, यह है शिशुओं से संबंधित कुछ पूर्व संस्कार, जिन पर लोग मान्यता रखते हैं और उनका महत्तव:

1. शिशु को उछालना (बेबी टासिंग)

यह चलन लगभग सात सौ वर्षों से दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे कर्नाटक और महाराष्ट्र में प्रचलित हैं। जहाँ दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को भक्तों द्वारा मंदिर की तीस फिट की ऊंचाई से नीचे एक बहुत बड़े फैले हुए कपड़े में फेंका जाता है। इसकी यह मान्यता है की यह शिशु के जीवन में खुशकिस्मती लाता है और इससे शिशु की उम्र भी बढ़ती है।

2. मुंडन संस्कार

यह ज़्यादातर हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है। यह रस्म दोनों प्रकार के लिंगों के शिशुओं के लिए की जाती है। यह माना जाता है कि शिशुओं के सर पर जन्म के बाद बढ़ने वाले बाल उनके बीते जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिशुओं की सभी अशुद्धियों को साफ करने और उन्हें शुद्ध करने के लिए उनके सर के बाल कम उम्र में एक बार अवश्य काटे जाते हैं। मुंडन संस्कार शिशुओं के जन्म के विषम महीने या विषम वर्ष में किया जाता है।

3. जटाक्रमा 

यह समारोह इस संसार में शिशु का स्वागत करने के लिए किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे शिशु और पिता के बीच संबंध मज़बूत होते हैं। पिता, शिशु के कान में ईश्वर के नाम को धीरे-धीरे बोलते हुए, शिशु की जीभ पर थोड़ा शहद और घी लगाते है। यह इसलिए भी किया जाता है ताकि शिशु पहली बार मीठा पदार्थ ही चखें, तो इससे वह जीवन में हमेशा मधुर बातें ही बोलेगा। यह समारोह नामकरण समारोह या हवन के बाद किया जाता है।

4. खतना

इस मान्यता के तहत छोटे लड़के के लिंग की ऊपरी चमड़ी को निकाल दिया जाता है। यह मान्यता शरीर की शुद्धता पर जोर देती है और छोटे लड़कों अर्थात शिशुओं में यह उनके शरीर की शुद्धता के लिए किया जाता है। यह रस्म शिशु के जन्म के बाद और उसके यौवनारंभ से पहले कभी भी की जा सकती है। इसके चिकित्सकीय प्रभाव भी साबित हुए हैं जैसे यह यूरेनेरी टरैक्ट इन्फेक्शन (uranery tract infections) को कम करता है और (balantis) ,जो की ऊपरी चमड़ी में होने वाली सूजन और जलन होती है,उससे भी बचाता है।

5. नामकरण

सिक्ख धर्म में नामकरण की मान्यता का विशेष महत्व है। शिशु को गुरूद्वारा ले जाकर अपने समुदाय से उनका परिचय कराया जाता है। जहाँ सिक्खों के धर्मगुरुजी, पवित्र ग्रंथ को खोलकर शुद्ध वचनों का उच्चारण करते हैं और इसके पहले अक्षर से शिशु का नाम चुना जाता है। उसके बाद शिशु के नाम की घोषणा की जाती है और समारोह स्थल में सबको मिठाई बाँटी जाती है।

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