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बीमारियां,जो नवजात शिशु को आसानी से प्रभावित करती है


जब शिशु जन्म लेते हैं,तब उनका प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह विकसित नहीं होता है। गर्भ में मां का प्रतिरक्षा तंत्र संक्रमण ,जो नुकसान पहुंचा सकते हैं उसे भ्रूण से दूर रखता है। जब शिशु जन्म लेता है,तो यह संरक्षण उपलब्ध नहीं होता है, जिससे शिशु के आसानी से संक्रमण और बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है। गंभीर बीमारी होने की संभावना शुरुआत के पहले तीन महीनों में बनी रहती है लेकिन इसके बाद घटने लगती है। हालांकि जबतक शिशु का प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह विकसित ना हो जाए,तब-तक संक्रमण और बीमारी की संभावना बनी रहती है।

इसके लक्षण क्या होते हैं?

यदि आपका शिशु बैक्टीरिया, वाइरस और पैरासाइट के संपर्क में आता है,तो यह उसे संक्रमित कर सकते हैं। इसलिए शिशु इन से संक्रमित होते हैं। इसके सामान्य लक्षण,जो शिशु में देखे जा सकते हैं,वह इस प्रकार है–

तापमान में उतार चढाव

सांस लेने में दिक्कत

चिड़चिड़ापन

रोना

भूख ना लगना

कुछ मामलों में संक्रमण से रैशेस और त्वचा में तकलीफ हो सकती है।

संभावित बिमारियां

बीमारियां,जो शिशु के जन्म के पहले चार हफ्तों में होती है उन्हें नवजात शिशुओं में होने वाले संक्रमण के रूप में जाना जाता है। अगर आप अपने शिशु में ऐसा कोई लक्षण देखे,तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें क्योंकि इलाज सबसे पहली प्राथमिकता है।

शिशुओं को प्रभावित करने वाली कुछ सामान्य समस्याएं में निम्न सम्मिलित हैं:

पीलिया - त्वचा का पीला पड़ जाना

बैक्टीरिया सट्रेप्टोकोकस द्वारा होने वाले रोग

बैक्टीरिया लिस्टिरिया द्वारा होने वाले रोग

ई- कोलाई संक्रमण द्वारा होने वाले रोग

इसमें निम्न रोग शामिल हैं –

सेप्सिस – खून में संक्रमण

निमोनिया – फेफड़ों में संक्रमण

आंख आना – आंख की झिल्ली में सूजन

मेनिनजाइटिस – दिमाग और रीढ की हड्डी की झिल्ली में सूजन।

मूत्रमार्ग में संक्रमण

बीमारियों की एक और श्रेणी है, जिन्हें जन्मजात बीमारी कहा जाता है, जो मां से नवजात शिशु में जाती है। और जन्म के समय मौजूद हो सकती है। इसमें एचआईवी, चिकन पॉक्स,हर्पिस,रूबेला और कई अन्य रोग शामिल हैं। एक बहुत सामान्य जन्मजात रोग है, काइटोमैगलियोवायरस, जिससे सुनने की क्षमता खो सकती है।

निवारण के लिए उपाय –

आपको यह ध्यान में रखना चाहिए कि शिशु, विशेषकर कि नवजात शिशु संक्रमित रोगों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। इसलिए अपने शिशु को संक्रमण से बचाने के लिए यह आवश्यक हो जाता है की इस खतरे को कम किया जाता है। यह करने के आसान तरीके इस प्रकार है:

अपने शिशु को पकड़ने से पहले हाथों को समय-समय पर धोंए ताकि हाथों में बैक्टीरिया होने का खतरा ना हो।

अपनी सतह को साफ और बैक्टीरिया मुक्त रखें जिसके संपर्क में शिशु आता है।

अपने शिशु को साफ रखें ताकि शिशु की त्वचा में मौजूद बैक्टीरिया खत्म हो जाए।

इस बात को सुनिश्चित करें कि आपका शिशु जिन वस्तुओ या बोतल के संपर्क में आता हो वह जीवाणुहीन हो।

जन्मजात संक्रमण के मामले में, माताओं को सही समय पर जांच करानी चाहिए, ताकि उचित उपचार और दवाइयों द्वारा बिमारी को भूर्ण तक जाने से रोका जा सके। एक और ध्यान रखने योग्य बिन्दु यह है कि शिशु को इनसे बचाया जाए इसलिए डॉक्टर की सलाह अनुसार शिशु को प्रतिरक्षा प्रदान करवाएं। टिकाकरण इससे लम्बी सुरक्षा प्रदान करता है इसलिए शिशु को टिका लगवाएं।

इन संक्रमित रोगों का उपचार करने के लिए आपको पेशेवर चिकित्सक की देखरेख की आवश्यकता होती है। अधिकतर बिमारियां,जो यहां बताई गई है, वह ऐंटिबायॉटिक द्वारा ठीक की जा सकती है। कुछ समस्याओं के लिए जैसे आंख आना, इसके इलाज के लिए आप आई ड्रॉप इस्तेमाल कर सकते हैं। कुछ समस्याएं जैसे रैशेस के लिए आप सुझाए गए क्रीम का इस्तेमाल कर सकते हैं। शिशु की नाज़ुक त्वचा का ध्यान रखते हुए,घर पर उपचार करने के बजाय, डॉक्टर से परामर्श लें। याद रखें कि शिशु में यह जताने की क्षमता नहीं होती है कि वह कैसा महसूस कर रहे या उन्हें कितनी असहजता हो रही है।

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