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अपने शिशु की अच्छी सेहत के लिए उसे ये खिलाएं


अंगूर संसार के सबसे प्रसिद्ध फलों में से एक है। अंगूर की विभिन्न किस्में संसार में मौजूद हैं। अंगूर वर्षों से मनुष्यों के बीच जाना जाता है। आज के युग में अंगूर वाइन से जुड़ा हुआ है लेकिन जब व्यक्ति ने अंगूर की खोज की तो उसने इसका सेवन इसकी मिठास के लिए किया।

क्या शिशु को अंगूर खिलाना सुरक्षित है?

जी हां, अपने शिशु को अंगूर का सेवन कराना पूरी तरह सुरक्षित है। लेकिन इसमे कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। शिशु को केवल मसला हुआ अंगूर दिया जाना चाहिए। शिशु को अंगूर का पूरा दाना ना दें क्योंकि इसके गले में फंसने की संभावना अधिक होती है। शिशु को अंगूर खिलाने की आदर्श आयु छह से आठ महीने है। यह खिलाने से पहले इस बात को सुनिश्चित कर लें की शिशु को इससे किसी प्रकार की एलर्जी ना हो।

यह अंगूर को अपने शिशु के आहार में शामिल करने के स्वास्थ्य लाभ:

एंटीऑक्सीडेंट की पूर्ति – एंटीऑक्सीडेंट नवजात शिशु के आकार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। अगर हम शिशु के आहार और वजन बढ़ने की गति को देखें तो शिशु को अधिक खाने की आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें शीघ्र वृद्धि करने की जरूरत है। जब अधिक मात्रा में आहार खाया जाता है और मैटाबॉलाइजड किया जाता है तो मुक्त रेडिकल बनते हैं,जो की आयन है और डी.एन.ए व आसपास की कोशिकाओं को स्थाई करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो कोशिकाओं और डी.एन.ए की क्षति शिशुओं में भी चिंता का विषय है। फल और सब्जियां एंटीऑक्सीडेंट्स के उत्तम स्त्रोत है और अंगूर भी इसमें सम्मिलित हैं। अपने शिशु को जब भी मौजूद हो, अंगूर का सेवन कराने से ना उनका नन्हा पेट भरता है बल्कि उन्हें रेडिकल क्षति से संरक्षण भी प्राप्त होता है|

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की रक्षा – शिशुओं का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र विकासशील प्रक्रिया में होता है। जैसे शिशु की वृद्धि होती है वैसी ही तंत्रिका तंत्र की भी। जैसे शिशु बड़ा होता है न्यूरल कनेक्शन भी उत्पन्न होता है। यह एक नाजुक संतुलन होता है जो भविष्य में शिशु की बौध्दिकता और स्मृति को प्रभावित करता है|

कब्ज से राहत – अंगूर में उत्तम मात्रा में डायटेरी फाइबर होता है। यह डायटेरी फाइबर मल त्याग को आसान बनाते हैं और बहुत अधिक पानी सोखते है। इससे मल त्याग करने में आसानी होती है और आंतों के लिए भी यह फ़ायदेमंद होता है।

सुपाच्य – अंगूर आसानी से पचने वाले फलों में से एक है और इसलिए अगर आपका शिशु अपच की समस्या से ग्रस्त हैं तो उसके लिए यह उत्तम फल है। इसे पेट की एसिडिटी हटाने के लिए भी जाना जाता है।

श्वसन तंत्र का उपाय – शिशुओं के श्वसन रोग जैसे सामान्य ज़ुखाम, खांसी, अस्थमा और (bronchitis) के सम्पर्क में आने की संभावना बनी रहती है। अपने शिशु को अंगूर देना अस्थमा की बीमारी का घरेलू उपाय है।

खून की गुणवत्ता और मात्रा को बढ़ाना – खून की गुणवत्ता से अर्थ हिमोग्लोबिन से है और खून की मात्रा से अभिप्राय लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या से है। रोजाना इसके सेवन से शिशुओं में रक्त की गुणवत्ता और मात्रा में बढ़ोतरी होती है।

लिवर को स्वस्थ रखना – अंगूर लिवर की गतिविधियों को बढ़ाते है और इसे स्वस्थ रखते हैं। इससे गतिविधि बढ़ती है और बाइल सेक्रेशन बढ़ता है। बाइल सेक्रेशन पाचन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है।

शिशु को अंगूर खिलाने से पहले निम्न सावधानियां बरतें:-

उन्हें पूरा अंगूर का दाना ना दें – शिशु के दाँत नहीं होते हैं इसलिए पूरा अंगूर का दाना देना अच्छा विचार नहीं है। शिशु के गले में अंगूर का दाना फंसने की संभावना होती है। अंगूर को मसलें और उसका गुद्दा शिशु को दें। इसे मसलते समय बीज हटा दें क्योंकि शिशु को बीज निगलने में समस्या होती है।

इसका जूस ना बनाएं – कई माता-पिता सोचते हैं की अंगूर मसलकर देने की अपेक्षा जूस निकाल कर देना बेहतर है। बालरोग विशेषज्ञ शिशुओं को जूस देने से मना करते हैं। आमतौर पर फलों का रस बहुत मीठा होता है और शिशु के दूध के दाँत आने में यह समस्या उत्पन्न करते हैं। इससे आने वाले महीनों में दाँत दर्द की समस्या भी हो सकती है।

अंगूर सही से धोएं – अंगूर शिशु को खिलाने से पहले अच्छी तरह धोएं क्योंकि हो सकता है उनमें किटनाशक स्प्रे डाला गया हों।

अंगूर का टेक्सचर – अंगूर खरीदने से पहले उनकी संरचना को देखें और ऐसे अंगूर लेने की कोशिश करें जो मुलायम, दागरहित और जिसमें छेद ना हो। खट्टे अंगूर ना खरीदें।

स्टोर – शिशु को अंगूर देने से पहले उसे रेफ्रिजरेटर से निकाल दें।

 

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